05/06/2026
5 दिन हो गए थे मुझे मिस्त्री के साथ प्लास्टर करते हुए।
सुबह-सुबह जब साइट पर पहुँचता, तो आधी बनी दीवारें जैसे मेरा इंतज़ार करती थीं। मिस्त्री बाल्टी में सीमेंट और रेत मिलाता, और मैं उसे उठाकर दीवार तक ले जाता। फिर तसले से दीवार पर प्लास्टर चढ़ता—धीरे-धीरे, परत दर परत।
पहले दिन हाथ कांपते थे, समझ नहीं आता था कितना मसाला उठाना है, कैसे बराबर फैलाना है। लेकिन मिस्त्री ने कहा था, “काम सीखना है तो धैर्य रख, दीवार खुद सिखा देगी।” बस उसी बात को पकड़कर मैं हर दिन थोड़ा-थोड़ा बेहतर होता गया।
चार दिन में मैंने जाना कि प्लास्टर सिर्फ दीवार को सुंदर बनाने के लिए नहीं होता, बल्कि उसे मजबूत भी बनाता है। अगर हाथ सही चला, तो दीवार सालों तक टिकेगी। अगर जल्दीबाज़ी की, तो मेहनत बेकार हो जाएगी।
पसीना बहता था, कपड़े सीमेंट से सफेद हो जाते थे, लेकिन दिल में एक अलग ही संतोष होता था। हर दीवार जो हम पूरा करते, वो जैसे मेरी मेहनत की गवाही देती।
शाम को जब काम खत्म होता, तो मैं पीछे मुड़कर उन दीवारों को देखता। सोचता—आज फिर मैंने कुछ बनाया है, कुछ ऐसा जो किसी का घर बनेगा, किसी की जिंदगी का हिस्सा बनेगा।
5 दिन में मैं सिर्फ प्लास्टर करना नहीं सीखा… मैंने मेहनत की कीमत समझी, और अपने हाथों पर भरोसा करना भी।